मैं तुम्हारे नाम लिखता हूँ…..

तेरी सांसों में मुझको…

Posted by: Desh Raj Sirswal on: June 28, 2008

तेरी सांसो में मुझको पनाह मिल जाए,
होश खो चुका हूँ कुछ तो सुकून मिल जाए।

अश्क बिखरते हैं मेरी इन निगाहों से हर सू
कुछ घड़ी को तो ये ठहर जाए।

मेरी तमन्ना मैं तेरे काबिल ना सही,
पर ये बता क्यों मेरी ख्वाहिशो की उमर घाट जाए।

मैंने जाना है तेरी हर दस्तक को,
क्योंकर भला यादों का सिलसिला रुक जाए।

एक तमाशा है हर आशिक ऐ “राज” यू ही सही,
फ़िर भी क्यों वो करम से बदतर सजा पाए॥
Dated: २८-जून-२००८

मैं तुम्हारे नाम लिखता हूँ,
उन सारी अनकही चाहतों को,
उन सभी अधूरे लम्हों को,
न पूरे हो सके जो कभी।

मैं तुम्हारे नाम लिखता हूँ,
उन सभी सपनों को,
जिन्होंने जन्म पाया तुम्हारे साथ से।

मैं तुम्हारे नाम लिखता हूँ,
मन की उन गहरियों को,
तह न पा सका मैं जिनकी स्वयं कभी।

मैं तम्हारे नाम लिखता हूँ ,
हर पल जागती,
हर पल रोटी,
उन भावनाओं को,
जिन्हें अपने शब्द न दे सका कभी
मैं तुम्हारे नाम लिखता हूँ…….
Dated:२६-०६-2008

किताब

Posted by: Desh Raj Sirswal on: June 24, 2008

  

कोई हमारे हाथ मे ऐसी किताब दे,
उलझे हुए सवाल का जो सीधा जबाव दे।

झुलस चुके हैं हालत-ऐ-गर्दिशों से,
एक पल ठहराव का जो आशियाँ दे दे।

मैं तो चला था अकेला अपने को समझ,
इस राह मे भटके हजारों इन्सान मिले।

जिन्दगी गुजर दी सिर्फ़ इस उम्मीद में,
कुछ पल खुशी के कभी हम भी तो जियें।

ऐसी इबादत के साये में हम सब चले,
टूटे हुए दिलों को जो फ़िर से जोड़ दे।

हिम्मत और सब्र वह रास्ता है ‘राज’,
मकसद-ऐ-जिन्दगी को जो सही-सही बयाँ दे॥

Dated:24-05-2006

तदबीर

Posted by: Desh Raj Sirswal on: June 21, 2008

तदबीर से बिगडी हुई , तकदीर बना ले ।
अपने पे भरोसा है ,तो इक दाव लगा ले।
हर हार इक सबक है दौर -ए -जवानी ।
इन लफ्जों कि तरज हर दिल में बैठा दे।
मैं नहीं चाहता तू हार के बैठे ,
दिल के दर्द को हकिकी ताज पहना दे ।
कहने भर से नहीं होता कुछ हासिल।
शमा इश्क कि हर दिल में जला दे ।
तू तो अकेला है इस राह -ए -मंजिल में ।
अपने कर्म से इक महफ़िल सजा दे ।
जीते तो सब हैं जो , इसके नहीं काबिल,
इस सच को “राज ” दुनिया , में फैला दे ।।

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  • महेन: सबकुछ उसके नाम लिख दिया क्या? क्या रंग बिखेरे हैं आपने रोम

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