Posted by: Desh Raj Sirswal on: June 24, 2008
झुलस चुके हैं हालत-ऐ-गर्दिशों से,
एक पल ठहराव का जो आशियाँ दे दे।
मैं तो चला था अकेला अपने को समझ,
इस राह मे भटके हजारों इन्सान मिले।
जिन्दगी गुजर दी सिर्फ़ इस उम्मीद में,
कुछ पल खुशी के कभी हम भी तो जियें।
ऐसी इबादत के साये में हम सब चले,
टूटे हुए दिलों को जो फ़िर से जोड़ दे।
हिम्मत और सब्र वह रास्ता है ‘राज’,
मकसद-ऐ-जिन्दगी को जो सही-सही बयाँ दे॥